नेल्सन मंडेला

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ये बर्र-ए-आज़म की सारी बलाएँ
सुना है कि अब मुंतशिर हो रही हैं
फ़लक-बोस तहज़ीब के कैक्टस झोंपड़ों की रिवायात को डस रहे हैं
मगर
कम नहीं ये कि अपनी ज़मीं और अपनी फ़ज़ा में
सियह पैकरों की दो-धारी अना और आहन इरादों ने
अपने लिए अब नए तेवरों के उजाले तराशे
अँधेरी ज़मीनों से मेरे निकाले
ख़त-ए-उस्तुवा के घने जंगलों की अमल-दारियों में हैं दीपक जलाए
क़बीलों की हर बाहमी जंग को शाख़-ए-ज़ैतून के ज़मज़मे हैं सुनाए
दहकते हुए रेग-ज़ारों के नीचे
सियह ज़र के चश्मों को महमेज़ दी है
ये तहरीक ये इंक़लाब सारे
नेल्सन मंडेला
तुम्हारी रगों में नया ख़ूँ शब-ओ-रोज़ पहुँचा रहे हैं
तुम्हारी हथेली को सूरज में तब्दील करने लगे हैं
तुम्हारी नज़र में भरे मंज़रों की धनक बो रहे हैं
सलाख़ों के पीछे अकेले नहीं तुम
सियह बर्र-ए-आज़म तुम्हारी जिलौ में
नहीं
सारी दुनिया तुम्हारी जिलौ में

बबूल के दरख़्त से कहो

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बबूल के दरख़्त से कहो
अभी मशाम-ए-जाँ में हर सिंघार की शगुफ़्तगी
बड़े ही इंहिमाक से बहार-पाश है यहाँ
जो मुड़ के देखता हूँ अध-जले गुलाब का बदन
शहादतों के रम्ज़ पर सिंघार भी लुटा गया
जो मुड़ के देखता हूँ फ़ाख़्ता का अहमरीं लहू
जबीन-ए-जौर की सभी रऊनतें मिटा गया
मिरे ख़िलाफ़ साज़िशों का ये मुहीब सिलसिला
मिरी अना के बाँकपन में दफ़अ'तन समा गया
चिनार के दरख़्त से है नारियल के पेड़ तक
रवाँ दवाँ हमारी ख़ुशबुओं का शोख़ सिलसिला
कबूतरों के ग़ोल की फबन हिरन की चौकड़ी
हवा के दोश-ए-मर्ग़ेज़ार को दुल्हन बना गई
अभी मिरी ज़मीन की फ़ज़ाएँ सुब्ह-ए-फ़ाम हैं
धुएँ के नाग से कहो
बड़ी ही सख़्त-जान हैं हमारी वादियों में रंग-ओ-नूर की लताफ़तें
समुंदरों की सीपियों से पोखरों की घोंंघियों ने
बैअतों के वास्ते सिपुर्द कब किया है ग़ैरतों के लाला-ज़ार को
अभी हिसार-ए-संग में कँवल के फूल हैं खिले
ज़बान-ए-रेग-ए-सुर्ख़ से कहो
हमारे पाँव जल गए तो क्या हुआ
बहार-ए-सब्ज़ के लिए ज़मीं तो आज मिल गई

मुझे ख़बर है मुझे यक़ीं है

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मुझे ख़बर है
ये आबनूसी चट्टान जो दूब के सब्ज़ तख़्ते पे आ गिरी है
नई सुबुक नर्म पत्तियों का सिंघार पी कर
सुनहरे लम्हों की साँस में फाँस बन कर अटक गई है
मुझे यक़ीं है
कि मौसमों के तिलिस्म ये तीरगी उड़ा कर
इसी सुलगती चट्टान पर दूब की सब्ज़ ज़ुल्फ़ें बिखेर देंगे
मुझे यक़ीं है
मिरे कटे बाज़ुओं की ताक़त मिरी रगों से नहीं गई है
मिरे लहू के ये सुर्ख़ धारे नई हिकायत के पेश-रौ हैं
नई उमंगों नए उजालों नए शफ़क़-ज़ार के अमीं हैं
मुझे ख़बर है
कि ग़ोल चिड़ियों के लश्कर-ए-अबरहा की अब कुछ ख़बर न लेंगे
हमारी आँखों में रौशनी है मगर दिलों में सियाहियाँ हैं
उदासियों के घने धुवें में छुपी हुई कामरानियाँ हैं
मुझे यक़ीं है
कि इस फ़ज़ा में फ़राज़-ए-सहरा-ए-बे-अमाँ हैं
हज़ारों मासूम एड़ियाँ रगड़ चुके हैं रगड़ रहे हैं
उबल पड़ेगा ज़रूर कोई हयात-अफ़रोज़ आब-ए-शीरीं
सदाक़तों के बहार-ज़ारों को आख़िरश ताज़गी मिलेगी
मुझे ख़बर है मुझे यक़ीं है

इम्बिसात-ए-अज़ली

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ऊँची नीची दूब पर लहराता हुआ काला नाग
झील के बाँहों से फूटता हुआ ज्वालामुखी
रंग-बिरंगे पंछी को पंजों में दबाए हुए बाज़
चट्टानों के पीछे मुर्दा जानवर की साफ़-ओ-शफ़्फ़ाफ़ ठिठुरी पर
भागते हुए सियाह चूहों की क़तार
चाँदनी रात में मछली पर झपटता हुआ ऊद-बिलाव
पतिंगे को पकड़ने के लिए लपकती हुई छिपकिली
सुरमई शाम के मल्गजे आकाश पर चढ़ती हुई आँधी
ये सारे मनाज़िर महा-नगर के एक कमरे में
वीडियो पर देख रहा हूँ
और
अहद-ए-हजर के अपने बुज़ुर्गों के फ़ितरी ख़ौफ़-ओ-तजस्सुस से भरे हुए
इम्बिसात को अपनी रगों से
सरगोशियाँ करते हुए पा रहा हूँ

एक रियाज़त ये भी

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वही दरिया किनारे
रोज़ अपनी बाँस की बंसी लिए बैठा हुआ वो शख़्स
कितनी बे-नियाज़ी से
हर इक लम्हे को अपनी ख़ुश-दिली से दाद देता है
कि जिस के रू-ए-रौशन पर क़नाअत मोरछल झलती हुई मोती लुटाती है
सहर-ता-शाम लहरों से वो अपनी बात कहता है
हवाओं की मधुर सरगोशियों पर खिलखिलाता है
परिंदों के सुहाने चहचहों पर झूम उठता है
किसी आवाज़ की आहट पे कजरी गुनगुनाता है
मगर उस की नज़र डोरी की हर जुम्बिश पे रहती है
कोई मछली फँसी तो इस के सीने में
कई रंगों की सुब्हें दफ़अतन मरपाश होती हैं
मगर ऐसा भी होता है
किसी दिन हाथ ख़ाली अपने घर वो लौट जाता है
कई मासूम आँखें जब सवाली बन के उठती हैं
वही मानूस सी इक मुस्कुराहट इस के चेहरे की
किसी नन्ही सी मछली की तरह इक जस्त लेती है
शिकस्ता झोंपड़े में एक बिजली कौंद जाती है

धनक

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एक कुत्ता झाड़ियों में ला-वारिस नौ-मौलूद बच्चे की हिफ़ाज़त कर रहा था
एक माँ अपने नन्हे बच्चे के गाल पर काजल का टीका लगा रही थी
एक मासूम बच्चे की उँगली पकड़ कर एक बूढ़ा और ना-बीना शख़्स
सड़क पार कर रहा था
रामिश-ओ-रंग में डूबी हुई बरात में हंडियों को अपने सरों पर
मज़दूर उठाए हुए थे
मेरी आँखों में आँसू थे और पालन-हार तू मुझे याद आ रहा था
दही बिलोती हुई मुशफ़िक़ माँ के होंटों से शहद में गूँधे हुए
कजरी के बोल फूट रहे थे
सरकंडा हाथ में लिए हुए नंग-धड़ंग चरवाहा बिर्हा की तान लगा रहा था
सूरज की नर्म किरनों के झाले में दरिया किनारे
सोहनी बर्तन मांझ रही थी
पूनम के हिंडोले पर चर्ख़ा कातती हुई दादी माँ को बच्चे ढूँड रहे थे
मेरी आँखों में आँसू थे और पालन-हार तू मुझे याद आ रहा था
फ़ज़ा के सूप में धूप को पछोरती हुई हवा
मेरे खपरैल में अमृत उंडेल गई थी
गेहूँ की हरी बालियों राई के उजले भूलों सरसों की नीली चुनरियों
और अलसी की नीली ओढ़नियों को देख कर
मेरे अब्बा की बूढ़ी आँखों से जुगनू गिरने लगे थे
नाै-माैैलूद बछड़े के जिस्म को चाटती हुई गाए पहलू में घास लिए खड़ी हुई
मेरी अमाँ को कनखियों से देख रही थी
मेरी बाजी अपने हिस्से का बासी दाल भात भूकी बिल्ली को खिला रही थी
मेरी आँखों में आँसू थे और पालन-हार
तू मुझे याद आ रहा था