ये हादसा मिरी आँखों से गर नहीं होता

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ये हादसा मिरी आँखों से गर नहीं होता
तो कोई ग़म भी मिरा हम-सफ़र नहीं होता
हवा के ख़ौफ़ से लो थरथराती रहती है
बुझे चराग़ को आँधी का डर नहीं होता
क़दम क़दम पे यहाँ ग़म की धूप बिखरी है
कोई सफ़र भी ख़ुशी का सफ़र नहीं होता
ख़ुदा की तरह मिरे दिल में गर न तू बसता
तो मेरा दिल भी इबादत का घर नहीं होता
किसी को यूँही वफ़ाओं से मत नवाज़ा कर
कि बे-वफ़ा पे वफ़ा का असर नहीं होता

मोहब्बत की गली से हम जहाँ हो कर निकल आए

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मोहब्बत की गली से हम जहाँ हो कर निकल आए
ग़ज़ल कहने के तब से ख़ुद-ब-ख़ुद मंज़र निकल आए
हमारे हाल पर कोई भी होता जी नहीं पाता
ग़ज़ल ने हाथ जब पकड़ा तो हम बच कर निकल आए
ये सरकारी महल भी किस क़दर कच्चे निकलते है
ज़रा बारिश हुई बुनियाद के पत्थर निकल आए
सिफ़ारिश के बिना जब भी चले हम हसरतें ले कर
हुई जब शाम तो मायूस अपने घर निकल आए
ज़रा सी देर हम ने नर्म लहजा क्या किया अपना
हमारे दुश्मनों के कैसे कैसे पर निकल आए

लोग सारे भले नहीं होते

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लोग सारे भले नहीं होते
हाँ मगर सब बुरे नहीं होते
मुद्दतों देख-भाल है लाज़िम
पेड़ यूँ ही खड़े नहीं होते
वो पतंगों का प्यार क्या जाने
जिन के घर में दिए नहीं होते
इश्क़ छुप कर कोई भले कर ले
राज़ उन के छुपे नहीं होते
ख़्वाब उन को हसीन लगता है
नींद से जो जगे नहीं होते
फूल समझा न होता शो'लों को
हाथ मेरे जले नहीं होते
प्यार छूता नहीं अगर दिल को
शे'र हम ने कहे नहीं होते

काएनात-ए-आरज़ू में हम बसर करने लगे

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काएनात-ए-आरज़ू में हम बसर करने लगे
सब बहुत नफ़रत से क्यूँ हम पर नज़र करने लगे
तेरे हर लम्हे का हम ने आज तक रक्खा हिसाब
ये अलग है बात ख़ुद को बे-ख़बर करने लगे
ज़िंदगी को अलविदा'अ कह कर चला जाऊँगा मैं
जब मिरी तन्हाई मुझ को दर-ब-दर करने लगे
मुल्क की बर्बादियाँ उस वक़्त तय हो जाएँगी
जब बुरी तहज़ीब बच्चों पर असर करने लगे
या-ख़ुदा राह-ए-वफ़ा पर रहबरी करना मेरी
जब मुझे गुमराह मेरा हम-सफ़र करने लगे
छोड़ कर उस वक़्त ओहदे ख़ुद चला जाऊँगा मैं
शक जहाँ कोई मिरे ईमान पर करने लगे
इश्क़ के उस मोड़ को सब लोग कहते हैं जुनूँ
दिल किसी को याद जब शाम-ओ-सहर करने लगे

जो मेरी छत का रस्ता चाँद ने देखा नहीं होता

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जो मेरी छत का रस्ता चाँद ने देखा नहीं होता
तो शायद चाँदनी ले कर यहाँ उतरा नहीं होता
दुआएँ दो तुम्हें मशहूर हम ने कर दिया वर्ना
नज़र-अंदाज़ कर देते तो ये जल्वा नहीं होता
अभी तो और भी मौसम पड़े है मेरे साए में
मैं बरगद का शजर हूँ मुद्दतों बूढ़ा नहीं होता
हसीनों से तमन्ना-ए-वफ़ा कम-ज़र्फ़ रखते हैं
ये ऐसा ख़्वाब है जो उम्र-भर पूरा नहीं होता
बड़े एहसान हैं मुझ पर तिरी मा'सूम यादों के
मैं तन्हा रास्तो में भी कभी तन्हा नहीं होता
मैं जब जब शेर की गहराइयों में डूब जाता हूँ
सिवा तेरे मिरे दिल में कोई चेहरा नहीं होता

हमारे सब्र का इक इम्तिहान बाक़ी है

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हमारे सब्र का इक इम्तिहान बाक़ी है
इसी लिए तो अभी तक ये जान बाक़ी है
वो नफ़रतों की इमारत भी गिर गई देखो
मोहब्बतों का ये कच्चा मकान बाक़ी है
मिरा उसूल है ग़ज़लों में सच बयाँ करना
मैं मर गया तो मिरा ख़ानदान बाक़ी है
मैं चाँद पर हूँ मगर मुतमइन नहीं हूँ मैं
मिरे परों में अभी भी उड़ान बाक़ी है
मिटा दो जिस्म से मेरी निशानियाँ लेकिन
तुम्हारी रूह पे मेरा निशान बाक़ी है
तुम्हें तो सच को उगलने की थी बड़ी आदत
तुम्हारे मुँह में अभी तक ज़बान बाक़ी है
हमारी मौत को बरसों गुज़र गए लेकिन
बदन का ख़ाक से अब तक मिलान बाक़ी है