लफ्ज़ो से कह नहीं सकता ये बात बहोत गंभीर है

लफ्ज़ो से कह नहीं सकता ये बात बहोत गंभीर है
उसकी गली के बाहर उसकी पहचान का फकीर है
फकीर का दर्द उसका मेहबूब भी समझ ना सका
उस फकीर का मेहबूब भी कितना बेरहम बे-पीर है

एक रोज़ उनके दरवाज़े की कुंडी में गुलाब छोड़ कर आय

एक रोज़ उनके दरवाज़े की कुंडी में गुलाब छोड़ कर आये थे
जब हमने हफ्ते भर उनकी गली के बेहद चक्कर लगाये थे
एक तूफान ने उस गुलाब को कुंडी हटा कर रास्ते पर फेंका
हमने अपने मेहबूब को ही वो गुलाब पैरों से मसलते देखा

Rajat Akela Dil

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