आब-ए-चश्म आए और नहाऊँ मैं

By farhat-ehsasFebruary 6, 2024
आब-ए-चश्म आए और नहाऊँ मैं
कुछ पियूँ और कुछ बहाऊँ मैं
आँसुओं का है इंतिज़ार मुझे
पानी बरसे तो लहलहाऊँ मैं


मैं कि मज़दूर-ए-'इश्क़ ख़ूँ में नहाऊँ
क्यों पसीने में ही नहाऊँ मैं
मेरे मरने पे लोग रोने लगे
उन के रोने पे क़हक़हाऊँ मैं


हो गया वस्ल जितना होना था
बिस्तर-ए-जिस्म अब तहाऊँ मैं
वो मुझे जितना सीधी राह पे लाए
और उतना ही गुम-रहाऊँ मैं


साँप हूँ मैं तो ये ज़रा सा क्यों
ख़ूब ज़हराऊँ अज़दहाऊँ मैं
चाहे जितना हूँ 'फ़रहत-उल्लाह-ख़ान'
'फ़रहत-एहसास' ही कहाऊँ मैं


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