आख़िरी ज़र्ब दिल पर लगाते हुए

By ahmar-nadeemFebruary 5, 2024
आख़िरी ज़र्ब दिल पर लगाते हुए
कौन रुख़्सत हुआ मुस्कुराते हुए
उन की दहलीज़ तक हम गए तो मगर
दस्तकें रास्तों में लुटाते हुए


कह गई थी सबा ये मिरे कान में
फिर इधर आऊँगी आते-जाते हुए
दिल लगाने को सारा जहाँ था मगर
सोचता कौन है दिल लगाते हुए


ज़िंदगी की तवालत का 'उक़्दा खुला
रेत पर इक घरौंदा बनाते हुए
कुछ सितारे थे रौशन जबीं पर मिरी
तुम ने देखा नहीं झिलमिलाते हुए


कितने रिश्तों का मैं ने भरम रख लिया
इक त'अल्लुक़ से दामन छुड़ाते हुए
कितने ही राज़ सब पर 'अयाँ हो गए
इक तिरा राज़-ए-उल्फ़त छुपाते हुए


यूँ गुज़रता रहा कारवान-ए-हयात
ख़ुद से अपना त'आरुफ़ कराते हुए
19195 viewsghazalHindi