आलाम-ए-रोज़गार से मर'ऊब हो गए

By ahmar-nadeemFebruary 5, 2024
आलाम-ए-रोज़गार से मर'ऊब हो गए
सारे उसूल 'इश्क़ के मा'यूब हो गए
शायद मैं अपने आप से ग़ाफ़िल न रह सका
कुछ लोग मेरी ज़ात से मंसूब हो गए


पहले-पहल तो हम पे तिरा कुछ असर हुआ
फिर देखते ही देखते मग़्लूब हो गए
पहुँचा न कुछ हमारा कहा उन के ज़ौक़ तक
समझे थे हम कि साहिब-ए-उसलूब हो गए


शोहरत की सादगी ने भी क्या क्या न कुछ किया
कितने ही बदतरीन थे जो ख़ूब हो गए
तेरा फ़िराक़ बा'इस-ए-कैफ़-ओ-नशात था
दुनिया तिरे विसाल में मज्ज़ूब हो गए


'अहमर' का क्या बना कोई पूछे तो ये कहो
नज़्र-ए-सितम-ज़रीफ़ी-ए-महबूब हो गए
46739 viewsghazalHindi