अभी तलक किसी गुमनाम आसमान में है

By syed-waseem-naqviJanuary 5, 2024
अभी तलक किसी गुमनाम आसमान में है
ख़ुदा का शुक्र परिंदा मिरा उड़ान में है
ख़मोशी जिस्म में पैवस्त हो गई है मगर
बस एक चीख़ है बाक़ी जो इम्तिहान में है


'अजीब रो'ब का 'आलम है ख़ौफ़ में है यज़ीद
असर कुछ ऐसा ही बीमार के बयान में है
तुम्हारे हिज्र का मारा ये ना-तवाँ कम-ज़र्फ़
हमारा दिल भी किसी वस्ल के गुमान में है


जो मेरी पुश्त पे करता है वार छुप-छुप कर
वो एक शख़्स मिरे अपने ख़ानदान में है
वो एक शख़्स जो अब मुझ पे हो गया है हराम
वो एक शख़्स जो अब भी मिरे गुमान में है


'अलम लगाया है ग़ाज़ी का तब से घर में 'वसीम'
ज़माने-भर का उजाला मिरे मकान में है
63219 viewsghazalHindi