अभी यक़ीन के मंसब पे मत बिठाओ मुझे

By wasim-nadirJanuary 5, 2024
अभी यक़ीन के मंसब पे मत बिठाओ मुझे
मैं चाहता हूँ ज़रा और आज़माओ मुझे
किसे बताऊँ कि अंदर से तोड़ देता है
कभी-कभार ये बाहर का रख-रखाव मुझे


वो जिस कहानी के आख़िर में दोनों मिल जाएँ
अगर हो ज़ेहन में कोई तो फिर सुनाओ मुझे
मैं आए दिन के खिताबों से आ गया हूँ तंग
जो हो सके तो मिरे नाम से बुलाओ मुझे


बहुत से ख़ानों में तक़्सीम कर के छोड़ेगा
दिल-ओ-दिमाग़ का 'नादिर' ये भेद-भाव मुझे
56271 viewsghazalHindi