'अदम से लाई है हस्ती में जुस्तुजू तेरी
By raft-bahraichiJanuary 4, 2024
'अदम से लाई है हस्ती में जुस्तुजू तेरी
ठहरने देगी यहाँ भी न आरज़ू तेरी
बसर हुई शब-ए-ग़म किस तरह से पूछ तो ले
मिरे तड़पने की शाहिद है आरज़ू तेरी
है का'बे में न तसल्ली न बुत-कदे में सुकूँ
मुझे कहीं का न रक्खेगी आरज़ू तेरी
शब-ए-फ़िराक़ में अब जान ले के निकलेगी
अजल के भेस में आई है आरज़ू तेरी
कलीम दे चुके अब मेरा इम्तिहाँ ले ले
मुझे भी तूर पे लाई है आरज़ू तेरी
तसल्लियाँ तो शब-ए-ग़म में दिल को देती है
कहूँगा तुझ से तो अच्छी है आरज़ू तेरी
बुतों को मरजा’-ए-हाजत बना न ऐ 'राफ़त'
कहीं बना न दे काफ़िर ये आरज़ू तेरी
ठहरने देगी यहाँ भी न आरज़ू तेरी
बसर हुई शब-ए-ग़म किस तरह से पूछ तो ले
मिरे तड़पने की शाहिद है आरज़ू तेरी
है का'बे में न तसल्ली न बुत-कदे में सुकूँ
मुझे कहीं का न रक्खेगी आरज़ू तेरी
शब-ए-फ़िराक़ में अब जान ले के निकलेगी
अजल के भेस में आई है आरज़ू तेरी
कलीम दे चुके अब मेरा इम्तिहाँ ले ले
मुझे भी तूर पे लाई है आरज़ू तेरी
तसल्लियाँ तो शब-ए-ग़म में दिल को देती है
कहूँगा तुझ से तो अच्छी है आरज़ू तेरी
बुतों को मरजा’-ए-हाजत बना न ऐ 'राफ़त'
कहीं बना न दे काफ़िर ये आरज़ू तेरी
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