ऐ दोस्त तुझ से दूर रहे या क़रीं रहे

By ishrat-jahangirpuriJanuary 3, 2024
ऐ दोस्त तुझ से दूर रहे या क़रीं रहे
क़िस्मत थी ये सुकूँ से कभी भी नहीं रहे
वो क्यों रह-ए-हयात में अंदोह-गीं रहे
जिस की नज़र में जल्वा-ए-हुस्न-ए-यक़ीं रहे


अक्सर तुम्हारी बज़्म से पलटे हैं इस तरह
महसूस ये हुआ कि जहाँ थे वहीं रहे
हंगामा-ए-चमन से उन्हें कुछ ग़रज़ नहीं
दीवाने फ़स्ल-ए-गुल में भी सहरा-नशीं रहे


धुँदली सी हो गई हैं फ़ज़ाएँ हयात की
हद्द-ए-तसव्वुरात में जब तुम नहीं रहे
मे'यार है वही तो कमाल-ए-नियाज़ का
इस आस्ताँ पे क्यों न हमारी जबीं रहे


आईना-ए-ख़ुलूस में धब्बे न मिल सके
'आजिज़ तमाम 'उम्र मिरे नुक्ता-चीं रहे
हर इक निगाह जिस की हो ख़ुद नुक्ता-आफ़रीं
फिर क्यों ख़याल ख़ैर का वो ख़ोशा-चीं रहे


हर तल्ख़ी-ए-ज़माना थी कैफ़-आफ़रीं मुझे
कम-बीं थे जो फ़िदा-ए-मय-ओ-अंग्बीं रहे
'इशरत' बता दो राज़-ए-मोहब्बत ज़माने को
दुनिया में क्यों ये कश्मकश-ए-कुफ़्र-ओ-दीं रहे


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