ऐसा लगता है वो नादान समझते हैं मुझे
By aalam-nizamiJanuary 18, 2024
ऐसा लगता है वो नादान समझते हैं मुझे
जो भी तफ़रीह का सामान समझते हैं मुझे
ख़ैरियत भी मिरी मा'लूम नहीं करते हैं
इस-क़दर लोग परेशान समझते हैं मुझे
शहर से आओ तो आने का सबब पूछते हैं
गाँव के लोग भी मेहमान समझते हैं मुझे
इस लिए मेरी ख़ुशामद नहीं करता कोई
सब मनाना बहुत आसान समझते हैं मुझे
मैं हूँ फ़नकार तो फ़नकार ही समझा जाए
आप क्यों हिंदू मुसलमान समझते हैं मुझे
मैं ने हर ज़ख़्म पे मरहम की नुमाइश की है
जाने क्यों लोग नमकदान समझते हैं मुझे
लोग क्या कहते हैं परवाह नहीं है 'आलम'
इतना काफ़ी है कि इंसान समझते हैं मुझे
जो भी तफ़रीह का सामान समझते हैं मुझे
ख़ैरियत भी मिरी मा'लूम नहीं करते हैं
इस-क़दर लोग परेशान समझते हैं मुझे
शहर से आओ तो आने का सबब पूछते हैं
गाँव के लोग भी मेहमान समझते हैं मुझे
इस लिए मेरी ख़ुशामद नहीं करता कोई
सब मनाना बहुत आसान समझते हैं मुझे
मैं हूँ फ़नकार तो फ़नकार ही समझा जाए
आप क्यों हिंदू मुसलमान समझते हैं मुझे
मैं ने हर ज़ख़्म पे मरहम की नुमाइश की है
जाने क्यों लोग नमकदान समझते हैं मुझे
लोग क्या कहते हैं परवाह नहीं है 'आलम'
इतना काफ़ी है कि इंसान समझते हैं मुझे
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