'अजब विसाल कि तक़रीब-ए-रू-नुमाई नहीं

By farhat-ehsasFebruary 6, 2024
'अजब विसाल कि तक़रीब-ए-रू-नुमाई नहीं
फिर ऐसा हिज्र कि जिस में कहीं जुदाई नहीं
लिबास-ए-जिस्म तो मौजूद है अभी तुझ पर
बरहना होना मिरी जान बे-हयाई नहीं


वो इक ग़ज़ल थी मगर रूह की ज़मीन में थी
हमारे ख़ाक-ज़दा क़ाफ़ियों में आई नहीं
ज़ियादा दिन नहीं टिकता किसी की नौकरी में
ये दिल का तर्ज़-ए-त'अल्लुक़ है बेवफ़ाई नहीं


मैं इंतिहाओं से आग़ाज़ कर रहा हूँ ये 'इश्क़
सो इस सफ़र में क़दम कोई इब्तिदाई नहीं
बदन तो भीगता रहता है बारिशों में बहुत
मगर मिरी बदनिय्यत अभी नहाई नहीं


अलग अलग ही अदा कीजिए ये दोगाना
अगर नमाज़-ए-जमा’अत में हम-नवाई नहीं
न भींच यूँ कि चटख़ जाए शीशा-ए-आग़ोश
गिरफ़्त ढीली भी रखने में कुछ बुराई नहीं


नशिस्त-ए-ख़ाक से उट्ठा नहीं कभी 'एहसास'
वो उठ के मसदर-ए-रूहानियत से आई नहीं
24299 viewsghazalHindi