'अजीब रस्मों रिवाजों का बोझ है हम पर
By syed-waseem-naqviJanuary 5, 2024
'अजीब रस्मों रिवाजों का बोझ है हम पर
बड़े बुज़ुर्गों की क़ब्रों का बोझ है हम पर
तुम्हीं बताओ कि हम हक़ को हक़ कहें कैसे
अमीर-ए-शहर के दानों का बोझ है हम पर
कि हम ने अपने समुंदर पे ज़ब्त पा तो लिया
तुम्हें पता नहीं लहरों का बोझ है हम पर
हम आसमान-ए-सख़ावत हैं बात मान तो लें
प क्या करें कि सितारों का बोझ है हम पर
हमें हमारी मोहब्बत न मिल सकेगी कभी
न जाने कितने रिवाजों का बोझ है हम पर
थकन उतार के हम सो तो जाएँगे लेकिन
सितम तो ये है कि ख़्वाबों का बोझ है हम पर
सिसकने लगते हैं अक्सर हमारे ख़्वाब 'वसीम'
उजाला हो के अँधेरों का बोझ है हम पर
बड़े बुज़ुर्गों की क़ब्रों का बोझ है हम पर
तुम्हीं बताओ कि हम हक़ को हक़ कहें कैसे
अमीर-ए-शहर के दानों का बोझ है हम पर
कि हम ने अपने समुंदर पे ज़ब्त पा तो लिया
तुम्हें पता नहीं लहरों का बोझ है हम पर
हम आसमान-ए-सख़ावत हैं बात मान तो लें
प क्या करें कि सितारों का बोझ है हम पर
हमें हमारी मोहब्बत न मिल सकेगी कभी
न जाने कितने रिवाजों का बोझ है हम पर
थकन उतार के हम सो तो जाएँगे लेकिन
सितम तो ये है कि ख़्वाबों का बोझ है हम पर
सिसकने लगते हैं अक्सर हमारे ख़्वाब 'वसीम'
उजाला हो के अँधेरों का बोझ है हम पर
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