'अमल से प्यार से मोहकम यक़ीं से निकलेगा

By ustad-vajahat-husain-khanJanuary 5, 2024
'अमल से प्यार से मोहकम यक़ीं से निकलेगा
ये पेड़ वो है जो बंजर ज़मीं से निकलेगा
जहाँ पहुँच के सभी थक के बैठ जाते हैं
मुझे यक़ीं है मिरा दर वहीं से निकलेगा


तू मेरे सज्दों को दीवानगी का नाम न दे
ये नक़्श वो है जो मेरी जबीं से निकलेगा
मिरे जुनून की शिद्दत को आप क्या जानें
कि आसमान भी मेरा ज़मीं से निकलेगा


यहाँ किसी के चलन पर न बद-गुमाँ होना
कहीं से कोई तो कोई कहीं से निकलेगा
है कौन उस का मुमासिल वो शख़्स जैसा है
मजाल किस की जो उस के क़रीं से निकलेगा


यूँही ग़ज़ल को पिलाऊँगा ख़ून-ए-दिल 'दाएम'
न 'ऐब फिर निगह-ए-नुक्ता-चीं से निकलेगा
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