बा'द तेरे क्या बताएँ और क्या चलता रहा
By anaam-damohiFebruary 5, 2024
बा'द तेरे क्या बताएँ और क्या चलता रहा
ज़िंदगी-भर ज़िंदगी का मसअला चलता रहा
रात-भर बैठा रहा मैं रू-ब-रू-ए-माहताब
और उस से तज़्किरा बस आप का चलता रहा
ख़्वाब में आती न थीं शहज़ादियाँ उन के कभी
मुफ़लिसों के ख़्वाब में भी फ़ासला चलता रहा
मारते हैं बस्तियों के लोग पत्थर क़ैस को
या'नी सहरा का सफ़र अच्छा-भला चलता रहा
लम्स को तेरे कभी मैं भूल ही पाया नहीं
साथ मेरे 'उम्र-भर इक हादिसा चलता रहा
शाख़-ए-दिल से झड़ चुकी थी 'इश्क़ की हर इक कली
रिश्ता अपने दरमियाँ बस नाम का चलता रहा
मैं तो बस तकता रहा उन के लब-ओ-रुख़्सार को
उन के दिल में अब ख़ुदा जाने कि क्या चलता रहा
'उम्र-भर पिन्हाँ रहा क़ल्ब-ओ-जिगर में तेरा ग़म
'उम्र-भर ख़ुशियों से मेरा फ़ासला चलता रहा
इस लिए 'इन'आम' मंज़िल तक न जा पाए क़दम
एक साया साथ मेरे ख़ौफ़ का चलता रहा
ज़िंदगी-भर ज़िंदगी का मसअला चलता रहा
रात-भर बैठा रहा मैं रू-ब-रू-ए-माहताब
और उस से तज़्किरा बस आप का चलता रहा
ख़्वाब में आती न थीं शहज़ादियाँ उन के कभी
मुफ़लिसों के ख़्वाब में भी फ़ासला चलता रहा
मारते हैं बस्तियों के लोग पत्थर क़ैस को
या'नी सहरा का सफ़र अच्छा-भला चलता रहा
लम्स को तेरे कभी मैं भूल ही पाया नहीं
साथ मेरे 'उम्र-भर इक हादिसा चलता रहा
शाख़-ए-दिल से झड़ चुकी थी 'इश्क़ की हर इक कली
रिश्ता अपने दरमियाँ बस नाम का चलता रहा
मैं तो बस तकता रहा उन के लब-ओ-रुख़्सार को
उन के दिल में अब ख़ुदा जाने कि क्या चलता रहा
'उम्र-भर पिन्हाँ रहा क़ल्ब-ओ-जिगर में तेरा ग़म
'उम्र-भर ख़ुशियों से मेरा फ़ासला चलता रहा
इस लिए 'इन'आम' मंज़िल तक न जा पाए क़दम
एक साया साथ मेरे ख़ौफ़ का चलता रहा
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