अपने बारे में वो गर पूछ लें फिर क्या कहिए
By ustad-vajahat-husain-khanJanuary 5, 2024
अपने बारे में वो गर पूछ लें फिर क्या कहिए
बरमला जान-ए-जिगर जान-ए-तमन्ना कहिए
उस की जादू-भरी आँखें हैं कि दो पैमाने
हासिल-ए-ज़ीस्त उसे हुस्न-ए-सरापा कहिए
लाख मैं नीची निगाहें रखूँ क्या होता है
वो अगर ख़ुद को नुमायाँ करें फिर क्या कहिए
जिस के देखे से मिरे दिल को सुकूँ मिलता है
ऐसे इंसाँ को घने पेड़ का साया कहिए
वो कि हर बात पे कहते हैं मुझे तू क्या है
ऐसे अंदाज़-ए-तकल्लुम को भला क्या कहिए
'अस्र-ए-हाज़िर में तो सच कहने से डर लगता है
फ़र्श को 'अर्श या क़ातिल को मसीहा कहिए
जिस की गुफ़्तार या लहजे में कशिश है 'दाएम'
उस की हर एक अदा आँख का धोका कहिए
बरमला जान-ए-जिगर जान-ए-तमन्ना कहिए
उस की जादू-भरी आँखें हैं कि दो पैमाने
हासिल-ए-ज़ीस्त उसे हुस्न-ए-सरापा कहिए
लाख मैं नीची निगाहें रखूँ क्या होता है
वो अगर ख़ुद को नुमायाँ करें फिर क्या कहिए
जिस के देखे से मिरे दिल को सुकूँ मिलता है
ऐसे इंसाँ को घने पेड़ का साया कहिए
वो कि हर बात पे कहते हैं मुझे तू क्या है
ऐसे अंदाज़-ए-तकल्लुम को भला क्या कहिए
'अस्र-ए-हाज़िर में तो सच कहने से डर लगता है
फ़र्श को 'अर्श या क़ातिल को मसीहा कहिए
जिस की गुफ़्तार या लहजे में कशिश है 'दाएम'
उस की हर एक अदा आँख का धोका कहिए
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