'अता कर दी किसी ने वो बला की तिश्नगी मुझ को
By balbir-rathiJanuary 2, 2024
'अता कर दी किसी ने वो बला की तिश्नगी मुझ को
न रास आएगी शायद ज़िंदगी-भर ज़िंदगी मुझ को
मिरी ये बेबसी तो ख़ैर कुछ ऐसी नहीं हमदम
मगर जीने नहीं देगी तिरी बेचारगी मुझ को
भला मैं रुत्बा-ए-दीवानगी का मुस्तहिक़ कब था
किसी के प्यार ने दे दी यूँही दीवानगी मुझ को
कोई मंज़िल भी हो वो मेरी मंज़िल हो नहीं सकती
अज़ल से ही मिली है बे-सबब आवारगी मुझ को
मुझे तो ज़िंदगी में बारहा महसूस होता है
मिरे मा'सूम ख़्वाबों ने ही दी है नग़मगी मुझ को
न रास आएगी शायद ज़िंदगी-भर ज़िंदगी मुझ को
मिरी ये बेबसी तो ख़ैर कुछ ऐसी नहीं हमदम
मगर जीने नहीं देगी तिरी बेचारगी मुझ को
भला मैं रुत्बा-ए-दीवानगी का मुस्तहिक़ कब था
किसी के प्यार ने दे दी यूँही दीवानगी मुझ को
कोई मंज़िल भी हो वो मेरी मंज़िल हो नहीं सकती
अज़ल से ही मिली है बे-सबब आवारगी मुझ को
मुझे तो ज़िंदगी में बारहा महसूस होता है
मिरे मा'सूम ख़्वाबों ने ही दी है नग़मगी मुझ को
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