बाग़ में सुब्ह-ओ-शाम आना जाना रहा लाला-ओ-गुल से मिलना मिलाना रहा
By kaleem-aajizJanuary 3, 2024
बाग़ में सुब्ह-ओ-शाम आना जाना रहा लाला-ओ-गुल से मिलना मिलाना रहा
जिस ज़माने की ये बात है दोस्तो अब वो मौसम न अब वो ज़माना रहा
हम ग़ज़ल गाएँ तू रक़्स कर साक़िया कि सलामत तिरा बादा-ख़ाना रहा
मय तो जाम-ओ-सुराही में भरपूर है ख़ूँ हमारी रगों में रहा न रहा
कौन ऐ 'इश्क़ तेरा पुजारी बने बज़्म में कोई अहल-ए-वफ़ा न रहा
एक गोशे में हम रह गए हैं यहाँ सो हमारा भी अब क्या ठिकाना रहा
ये तो सच है कि सरमाया-ए-आबरू आज चंद आँसुओं के सिवा न रहा
तंज़ से जिन पे तुम हँस रहे हो गुलो कल इन्हीं जेब-ओ-दामन में क्या न रहा
यूँ तो कहने को हम चाक-दामाँ भी हैं ज़ुल्फ़-ए-बरहम की सूरत परेशाँ भी हैं
जब से सर फोड़ लेने की 'आदत गई तब से दीवानगी में मज़ा न रहा
'अक़्ल बेचारी लर्ज़ा-बर-अंदाम है हिम्मत-ए-‘इश्क़ चल अब तिरा काम है
मंज़िल-ए-दार पर लोग यूँ रुक गए जैसे आगे कोई रास्ता न रहा
गरचे 'आजिज़' हैं हम और नादार हैं महफ़िल-ए-शाद के रिंद-ए-ख़ुद्दार हैं
ये ख़ुदा-साज़ चुल्लू सलामत रहे जाम की क्या शिकायत रहा न रहा
जिस ज़माने की ये बात है दोस्तो अब वो मौसम न अब वो ज़माना रहा
हम ग़ज़ल गाएँ तू रक़्स कर साक़िया कि सलामत तिरा बादा-ख़ाना रहा
मय तो जाम-ओ-सुराही में भरपूर है ख़ूँ हमारी रगों में रहा न रहा
कौन ऐ 'इश्क़ तेरा पुजारी बने बज़्म में कोई अहल-ए-वफ़ा न रहा
एक गोशे में हम रह गए हैं यहाँ सो हमारा भी अब क्या ठिकाना रहा
ये तो सच है कि सरमाया-ए-आबरू आज चंद आँसुओं के सिवा न रहा
तंज़ से जिन पे तुम हँस रहे हो गुलो कल इन्हीं जेब-ओ-दामन में क्या न रहा
यूँ तो कहने को हम चाक-दामाँ भी हैं ज़ुल्फ़-ए-बरहम की सूरत परेशाँ भी हैं
जब से सर फोड़ लेने की 'आदत गई तब से दीवानगी में मज़ा न रहा
'अक़्ल बेचारी लर्ज़ा-बर-अंदाम है हिम्मत-ए-‘इश्क़ चल अब तिरा काम है
मंज़िल-ए-दार पर लोग यूँ रुक गए जैसे आगे कोई रास्ता न रहा
गरचे 'आजिज़' हैं हम और नादार हैं महफ़िल-ए-शाद के रिंद-ए-ख़ुद्दार हैं
ये ख़ुदा-साज़ चुल्लू सलामत रहे जाम की क्या शिकायत रहा न रहा
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