बाहर की क्या याद आए घर याद नहीं आता
By farhat-ehsasFebruary 6, 2024
बाहर की क्या याद आए घर याद नहीं आता
अब तो अपना जिस्म भी अक्सर याद नहीं आता
ज़ख़्मों की सारी तहरीरें यकसाँ लगती हैं
किस ने मारा पहला पत्थर याद नहीं आता
कहाँ उठाया कहाँ झुकाया कहाँ कटाया था
इतने किरदारों वाला सर याद नहीं आता
रूह कहाँ की जब जिस्म-ओ-जाँ पर बन आई हो
कोई क़लंदर कोई पयम्बर याद नहीं आता
करते करते रक़्स ठहर जाता हूँ घबरा कर
जब भी अपने रक़्स का महवर याद नहीं आता
अपनी शान-ए-नुज़ूल समझ में आने लगती है
जब कोई अपने से बरतर याद नहीं आता
क़तरे ने आप अपनी शख़्सिय्यत हासिल कर ली
बाग़ी को अब मुल्क-ए-समुंदर याद नहीं आता
तुझ को तो सब याद है जान-ए-मन 'फ़रहत-एहसास'
तू ही क्यों फिर आगे बढ़ कर याद नहीं आता
अब तो अपना जिस्म भी अक्सर याद नहीं आता
ज़ख़्मों की सारी तहरीरें यकसाँ लगती हैं
किस ने मारा पहला पत्थर याद नहीं आता
कहाँ उठाया कहाँ झुकाया कहाँ कटाया था
इतने किरदारों वाला सर याद नहीं आता
रूह कहाँ की जब जिस्म-ओ-जाँ पर बन आई हो
कोई क़लंदर कोई पयम्बर याद नहीं आता
करते करते रक़्स ठहर जाता हूँ घबरा कर
जब भी अपने रक़्स का महवर याद नहीं आता
अपनी शान-ए-नुज़ूल समझ में आने लगती है
जब कोई अपने से बरतर याद नहीं आता
क़तरे ने आप अपनी शख़्सिय्यत हासिल कर ली
बाग़ी को अब मुल्क-ए-समुंदर याद नहीं आता
तुझ को तो सब याद है जान-ए-मन 'फ़रहत-एहसास'
तू ही क्यों फिर आगे बढ़ कर याद नहीं आता
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