बहकी बहकी हुई चलती है हवा आख़िर-ए-शब

By shehzad-anjum-burhaniJanuary 5, 2024
बहकी बहकी हुई चलती है हवा आख़िर-ए-शब
बंद करता है कोई बंद-ए-क़बा आख़िर-ए-शब
शब-ए-रफ़्ता की कहानी न कहीं दोहरा दे
दूर से आती हुई तेरी सदा आख़िर-ए-शब


आख़िर-ए-शब में ही असरार-ए-बदन खुलते हैं
चाँद करता है तिरे हक़ में दु'आ आख़िर-ए-शब
आख़िर-ए-शब में ही होता है तसर्रुफ़ ख़ुद पर
रग-ए-जाँ में उतर आता है ख़ुदा आख़िर-ए-शब


फड़फड़ाते हुए शाख़ों से परिंदा निकला
दूर सन्नाटे में इक शोर उठा आख़िर-ए-शब
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