बस इस लिए तुम्हें भेजा था लिख के हाँ काग़ज़
By hakeem-aagha-jan-aishJanuary 3, 2024
बस इस लिए तुम्हें भेजा था लिख के हाँ काग़ज़
कि मेरा हाल करे तुम से कुछ बयाँ काग़ज़
ख़ुदा के वास्ते किस तरह पहुँचे वहाँ काग़ज़
न ले के जा सके जिस जा फ़रिश्ता ख़ाँ काग़ज़
अभी लिखा भी न था हाल-ए-सीना-ए-पुर-दाग़
कि बन गया यूँही सद शक-ए-गुलिस्ताँ काग़ज़
मैं हाल-ए-सोज़-ए-दिल अपना लिख्खूँ तो कैसे लिख्खूँ
हज़र है ख़ामा को माँगे है अल-अमाँ काग़ज़
अब इस को क्या करूँ वहाँ तक पहुँच नहीं सकता
जो एक है मिरा कम्बख़्त राज़दाँ काग़ज़
समझ के ख़त मिरा ग़ैरों का भी नहीं लेता
ये बद-गुमानी है वो शोख़ बद-गुमाँ काग़ज़
जो पहुँचे हाथ तक उस माह-रू के क़िस्मत से
तो पैदा करता है ख़ासियत-ए-कताँ काग़ज़
ख़ुदा के वास्ते छुप-छुप के हम से फ़रमाओ
ये रोज़ भेजो हो लिख लिख के किस के हाँ काग़ज़
लिखा जो मैं ने कि ख़त के जवाब में तुम ने
लिखा न भूल के हम को कभी अयाँ काग़ज़
तो फिर के आप ने क़ासिद से ये कहा कि यहाँ
कहाँ दवात कहाँ ख़ामा और कहाँ काग़ज़
न पहुँचे 'ऐश' उसे हम ने बारहा लिखे
हज़ार-हैफ़ गए यूँही राएगाँ काग़ज़
कि मेरा हाल करे तुम से कुछ बयाँ काग़ज़
ख़ुदा के वास्ते किस तरह पहुँचे वहाँ काग़ज़
न ले के जा सके जिस जा फ़रिश्ता ख़ाँ काग़ज़
अभी लिखा भी न था हाल-ए-सीना-ए-पुर-दाग़
कि बन गया यूँही सद शक-ए-गुलिस्ताँ काग़ज़
मैं हाल-ए-सोज़-ए-दिल अपना लिख्खूँ तो कैसे लिख्खूँ
हज़र है ख़ामा को माँगे है अल-अमाँ काग़ज़
अब इस को क्या करूँ वहाँ तक पहुँच नहीं सकता
जो एक है मिरा कम्बख़्त राज़दाँ काग़ज़
समझ के ख़त मिरा ग़ैरों का भी नहीं लेता
ये बद-गुमानी है वो शोख़ बद-गुमाँ काग़ज़
जो पहुँचे हाथ तक उस माह-रू के क़िस्मत से
तो पैदा करता है ख़ासियत-ए-कताँ काग़ज़
ख़ुदा के वास्ते छुप-छुप के हम से फ़रमाओ
ये रोज़ भेजो हो लिख लिख के किस के हाँ काग़ज़
लिखा जो मैं ने कि ख़त के जवाब में तुम ने
लिखा न भूल के हम को कभी अयाँ काग़ज़
तो फिर के आप ने क़ासिद से ये कहा कि यहाँ
कहाँ दवात कहाँ ख़ामा और कहाँ काग़ज़
न पहुँचे 'ऐश' उसे हम ने बारहा लिखे
हज़ार-हैफ़ गए यूँही राएगाँ काग़ज़
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