बे-रुख़ी हद से बढ़ी और सिर्फ़ इतना ही नहीं
By saleem-ahmedJanuary 4, 2024
बे-रुख़ी हद से बढ़ी और सिर्फ़ इतना ही नहीं
अब तो ये 'आलम है गोया रब्त कुछ था ही नहीं
पूछती है वो नज़र क्या है मोहब्बत का मआल
बे-ख़ुदी-ए-‘इश्क़ कहती है कि सोचा ही नहीं
हाल-ए-दिल नाग़ुफ़्तनी है हम जो कहते भी तो क्या
फिर भी ग़म ये है कि उस ने हम से पूछा ही नहीं
बज़्म-ए-याराँ में हैं क्या क्या तज़्किरे चुप हैं तो हम
जैसे वो हुस्न-ए-दिल-आरा हम ने देखा ही नहीं
शिकवा-ए-बेगानगी जिन को है उन से क्या कहें
इल्तिफ़ात-ए-दोस्त का मारा पनपता ही नहीं
हुस्न की हर कज-अदाई बे-रुख़ी बेगानगी
स’ई-ए-ज़ब्त-ए-आरज़ू थी कोई समझा ही नहीं
क्या शिकायत कीजिए उस बद-गुमान-ए-शौक़ से
वो हमें अपने वफ़ादारों में गिनता ही नहीं
सारे शिकवे सब गिले अपनी जगह लेकिन 'सलीम'
किस तरह कह दूँ कि उस को मेरी पर्वा ही नहीं
अब तो ये 'आलम है गोया रब्त कुछ था ही नहीं
पूछती है वो नज़र क्या है मोहब्बत का मआल
बे-ख़ुदी-ए-‘इश्क़ कहती है कि सोचा ही नहीं
हाल-ए-दिल नाग़ुफ़्तनी है हम जो कहते भी तो क्या
फिर भी ग़म ये है कि उस ने हम से पूछा ही नहीं
बज़्म-ए-याराँ में हैं क्या क्या तज़्किरे चुप हैं तो हम
जैसे वो हुस्न-ए-दिल-आरा हम ने देखा ही नहीं
शिकवा-ए-बेगानगी जिन को है उन से क्या कहें
इल्तिफ़ात-ए-दोस्त का मारा पनपता ही नहीं
हुस्न की हर कज-अदाई बे-रुख़ी बेगानगी
स’ई-ए-ज़ब्त-ए-आरज़ू थी कोई समझा ही नहीं
क्या शिकायत कीजिए उस बद-गुमान-ए-शौक़ से
वो हमें अपने वफ़ादारों में गिनता ही नहीं
सारे शिकवे सब गिले अपनी जगह लेकिन 'सलीम'
किस तरह कह दूँ कि उस को मेरी पर्वा ही नहीं
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