बे-सर-ओ-सामाँ थे लेकिन इतना अंदाज़ा न था
By ahmad-farazJanuary 1, 2024
बे-सर-ओ-सामाँ थे लेकिन इतना अंदाज़ा न था
इस से पहले शहर के लुटने का आवाज़ा न था
ज़र्फ़-ए-दिल देखा तो आँखें कर्ब से पथरा गईं
ख़ून रोने की तमन्ना का ये ख़म्याज़ा न था
आ मिरे पहलू में आ ऐ रौनक़-ए-बज़्म-ए-ख़याल
लज़्ज़त-ए-रुख़सार-ओ-लब का अब तक अंदाज़ा न था
हम ने देखा है ख़िज़ाँ में भी तिरी आमद के बा'द
कौन सा गुल था कि गुलशन में तर-ओ-ताज़ा न था
हम क़सीदा-ख़्वाँ नहीं उस हुस्न के लेकिन 'फ़राज़'
इतना कहते हैं रहीन-ए-सुर्मा-ओ-ग़ाज़ा न था
इस से पहले शहर के लुटने का आवाज़ा न था
ज़र्फ़-ए-दिल देखा तो आँखें कर्ब से पथरा गईं
ख़ून रोने की तमन्ना का ये ख़म्याज़ा न था
आ मिरे पहलू में आ ऐ रौनक़-ए-बज़्म-ए-ख़याल
लज़्ज़त-ए-रुख़सार-ओ-लब का अब तक अंदाज़ा न था
हम ने देखा है ख़िज़ाँ में भी तिरी आमद के बा'द
कौन सा गुल था कि गुलशन में तर-ओ-ताज़ा न था
हम क़सीदा-ख़्वाँ नहीं उस हुस्न के लेकिन 'फ़राज़'
इतना कहते हैं रहीन-ए-सुर्मा-ओ-ग़ाज़ा न था
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