बेकार जिया करते हो मर क्यों नहीं जाते

By farooque-adilJanuary 2, 2024
बेकार जिया करते हो मर क्यों नहीं जाते
जब टूट चुके हो तो बिखर क्यों नहीं जाते
मा'लूम है हो जाएगा ग़र्क़ाब सफ़ीना
टूटी हुई कश्ती से उतर क्यों नहीं जाते


फूलों की तमन्ना है अगर दिल में ज़रा भी
हँसते हुए काँटों से गुज़र क्यों नहीं जाते
फ़िर्क़ों में बटे हो कहीं ज़ातों में बटे हो
हालात के मारे हो सुधर क्यों नहीं चाहते


बेज़ार अगर 'अहद-ए-वफ़ा से है तबी'अत
ऐसा करो वा'दे से मुकर क्यों नहीं जाते
'फ़ारूक़' ये क्या हाल बना रक्खा है तुम ने
अब रात गुज़रने को है घर क्यों नहीं जाते


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