बिसात-ए-वक़्त पे वो चाल चल रहा हूँ मैं
By mohsin-changeziJanuary 4, 2024
बिसात-ए-वक़्त पे वो चाल चल रहा हूँ मैं
कि अपनी 'उम्र से आगे निकल रहा हूँ मैं
गुमान तक नहीं उस को मिरे तग़य्युर का
कुछ इस सलीक़े से ख़ुद को बदल रहा हूँ मैं
नशे की मौज में ये भी न हो सका मा'लूम
कि ये तो आग की लपटें मसल रहा हूँ मैं
ख़ुद अपनी दीद की ख़्वाहिश है मुझ को मुद्दत से
ख़ुद अपने हिज्र की हिद्दत में जल रहा हूँ मैं
यही तो है मिरे इदराक की सज़ा 'मोहसिन'
सिरात-ए-बे-ख़बरी पर जो चल रहा हूँ मैं
कि अपनी 'उम्र से आगे निकल रहा हूँ मैं
गुमान तक नहीं उस को मिरे तग़य्युर का
कुछ इस सलीक़े से ख़ुद को बदल रहा हूँ मैं
नशे की मौज में ये भी न हो सका मा'लूम
कि ये तो आग की लपटें मसल रहा हूँ मैं
ख़ुद अपनी दीद की ख़्वाहिश है मुझ को मुद्दत से
ख़ुद अपने हिज्र की हिद्दत में जल रहा हूँ मैं
यही तो है मिरे इदराक की सज़ा 'मोहसिन'
सिरात-ए-बे-ख़बरी पर जो चल रहा हूँ मैं
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