चाँद छूने के तसव्वुर से मचल जाता हूँ

By aftab-shahFebruary 23, 2025
चाँद छूने के तसव्वुर से मचल जाता हूँ
तुझ को सोचूँ तो उसी वक़्त बहल जाता हूँ
तुम वो धागा हो जो लिपटा है मिरे सीने से
आग लगती है तुम्हें और मैं जल जाता हूँ


दिन को साया सा भटकता हूँ बदन-ज़ारों में
रात पड़ते ही किसी रूह में ढल जाता हूँ
ना-ख़ुदाओं से ख़ुदाओं के भरोसे पे सदा
हादिसा होता नहीं और बदल जाता हूँ


वैसे फ़ौलाद हूँ ज़िद्दी हूँ इरादों में मगर
सामने हो वो तो लम्हों में पिघल जाता हूँ
जिस में ग़ीबत को मोहब्बत से निखारा जाए
ऐसी मज्लिस से सर-ए-दस्त निकल जाता हूँ


कर के पाबंद खुली आँख ज़माने के लिए
सोचें इज़हार की चुप-चाप निगल जाता हूँ
जाने किस कर्ब से गुज़रे हैं मोहब्बत वाले
उन की चीख़ों को जो सुनता हूँ दहल जाता हूँ


दर्द बढ़ता है तो लगता है कि जाँ ले लेगा
तेरी आग़ोश में सिमटूँ तो सँभल जाता हूँ
57045 viewsghazalHindi