चराग़ दोश-ए-हवा पे रौशन खड़े हुए थे
By mahwar-sirsiviJanuary 3, 2024
चराग़ दोश-ए-हवा पे रौशन खड़े हुए थे
कमाल ये है क़ज़ा के सर पर चढ़े हुए थे
फ़लक के दामन पे जो सितारे चमक रहे हैं
हमारी चौखट पे सर-ब-सज्दा पड़े हुए थे
नए शजर खिलखिला रहे थे ख़िज़ाँ की रुत में
क़दीमी पेड़ों के ताज़ा पत्ते झड़े हुए थे
किसी की ग़ुर्बत का नूर रुख़ से छलक रहा था
किसी की बाली में हीरे मोती जड़े हुए थे
वहाँ पे सब्र-ओ-रज़ा ने खे़मे लगाए अपने
जहाँ पे ज़ुल्म-ओ-सितम के परचम गड़े हुए थे
हमारे ज़ख़्मों से मक्खियों ने मज़े उठाए
कुछ 'अहद-ए-माज़ी के घाव अब तक सड़े हुए थे
मुहाजिरों को पता है अपने वतन की क़ीमत
ये वो परिंदे हैं जो यहाँ पर बड़े हुए थे
उसी ने पहला क़दम बग़ावत की सम्त रक्खा
वो जिस की उल्फ़त के तीर दिल में गड़े हुए थे
अजल से मिलने की आरज़ू में जनाब-ए-'महवर'
शराब-ख़ाने में ज़िंदगी से लड़े हुए थे
कमाल ये है क़ज़ा के सर पर चढ़े हुए थे
फ़लक के दामन पे जो सितारे चमक रहे हैं
हमारी चौखट पे सर-ब-सज्दा पड़े हुए थे
नए शजर खिलखिला रहे थे ख़िज़ाँ की रुत में
क़दीमी पेड़ों के ताज़ा पत्ते झड़े हुए थे
किसी की ग़ुर्बत का नूर रुख़ से छलक रहा था
किसी की बाली में हीरे मोती जड़े हुए थे
वहाँ पे सब्र-ओ-रज़ा ने खे़मे लगाए अपने
जहाँ पे ज़ुल्म-ओ-सितम के परचम गड़े हुए थे
हमारे ज़ख़्मों से मक्खियों ने मज़े उठाए
कुछ 'अहद-ए-माज़ी के घाव अब तक सड़े हुए थे
मुहाजिरों को पता है अपने वतन की क़ीमत
ये वो परिंदे हैं जो यहाँ पर बड़े हुए थे
उसी ने पहला क़दम बग़ावत की सम्त रक्खा
वो जिस की उल्फ़त के तीर दिल में गड़े हुए थे
अजल से मिलने की आरज़ू में जनाब-ए-'महवर'
शराब-ख़ाने में ज़िंदगी से लड़े हुए थे
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