चेहरे में कशिश है मह-ओ-अंजुम से ज़ियादा

By farooque-adilJanuary 2, 2024
चेहरे में कशिश है मह-ओ-अंजुम से ज़ियादा
महफ़िल में हसीं कोई नहीं तुम से ज़ियादा
मक़्तल में तिरे हुस्न के ये सीन 'अजब था
ख़ंजर से मरे कम हैं तबस्सुम से ज़ियादा


सौ बात की इक बात बुज़ुर्गों ने बताई
है लुत्फ़ ख़मोशी में तकल्लुम से ज़ियादा
मौजों का कोई ख़ौफ़ न तूफ़ाँ का कोई डर
माझी से मैं डरता हूँ तलातुम से ज़ियादा


मश्कूक निगाहों से न देखा करो उस को
अश'आर वो कहता है मियाँ तुम से ज़ियादा
जब आ गए महफ़िल में सुख़न-फ़हम सुख़न-साज़
शे'रों पे मिली दाद तरन्नुम से ज़ियादा


तक़रीर वो करता है बड़े जोश में लेकिन
जो शख़्स पढ़ा ही नहीं पंजुम से ज़ियादा
इस दौर-ए-तिजारत का 'अजब हाल है 'फ़ारूक़'
सिक्कों में तवानाई है गंदुम से ज़ियादा


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