दफ़'अतन घटा की आड़ से चाँदनी कशीद हो गई
By aalam-nizamiJanuary 18, 2024
दफ़'अतन घटा की आड़ से चाँदनी कशीद हो गई
ज़ुल्फ़ उस के चेहरे से हटी और मेरी 'ईद हो गई
रोज़ रोज़ मिलना आप से है ख़ता मगर मैं क्या करूँ
ये ख़ता बहुत हसीन थी इस लिए मज़ीद हो गई
जब से तुम ने मुझ फ़क़ीर पर की है इल्तिफ़ात की नज़र
यूँ हुआ कि शख़्सियत मिरी ख़ुद मिरी मुरीद हो गई
'मीर' के तख़य्युलात का शहद जब से फ़िक्र में घुला
और भी शु'ऊर आ गया शा'इरी जदीद हो गई
थी फ़ज़ा वफ़ा की ख़ुश-गवार अपने दौर-ए-इक़्तिदार में
मिट गया वफ़ाओं का निशाँ अब जफ़ा शदीद हो गई
ऐ 'निज़ामी' काएनात में कर्बला से ले के आज तक
जब कहीं हुसैनियत बढ़ी तो फ़ज़ा यज़ीद हो गई
ज़ुल्फ़ उस के चेहरे से हटी और मेरी 'ईद हो गई
रोज़ रोज़ मिलना आप से है ख़ता मगर मैं क्या करूँ
ये ख़ता बहुत हसीन थी इस लिए मज़ीद हो गई
जब से तुम ने मुझ फ़क़ीर पर की है इल्तिफ़ात की नज़र
यूँ हुआ कि शख़्सियत मिरी ख़ुद मिरी मुरीद हो गई
'मीर' के तख़य्युलात का शहद जब से फ़िक्र में घुला
और भी शु'ऊर आ गया शा'इरी जदीद हो गई
थी फ़ज़ा वफ़ा की ख़ुश-गवार अपने दौर-ए-इक़्तिदार में
मिट गया वफ़ाओं का निशाँ अब जफ़ा शदीद हो गई
ऐ 'निज़ामी' काएनात में कर्बला से ले के आज तक
जब कहीं हुसैनियत बढ़ी तो फ़ज़ा यज़ीद हो गई
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