दाग़-ए-दिल से मह-ओ-ख़ुर्शीद को निस्बत क्या है
By raft-bahraichiJanuary 4, 2024
दाग़-ए-दिल से मह-ओ-ख़ुर्शीद को निस्बत क्या है
सामने आएँ तो खुल जाए हक़ीक़त क्या है
जो समझता ही नहीं रम्ज़-ए-मोहब्बत क्या है
दिल उसे देते हैं अपनी भी तबी'अत क्या है
तेरे दीवाने को फ़िक्र-ए-ग़म-ए-राहत क्या है
वो समझता ही नहीं दोज़ख़-ओ-जन्नत क्या है
बन गई हर रग-ए-जाँ रिश्ता-ए-शम’-ए-सोज़ाँ
नासेहा पूछ न सोज़-ए-तप-ए-फ़ुर्क़त क्या है
मर चुके दफ़्न हुए मिट गया तुर्बत का निशाँ
अब उन्हें क़ब्र पे आने की ज़रूरत क्या है
जब नज़र आता है हर चीज़ में जल्वा तेरा
फिर मैं क्यों पूछूँ कि कसरत में ये वहदत क्या है
सर-ब-ख़म हो गए हम देखते ही ऐ क़ातिल
तिरी तलवार भी मेहराब-ए-‘इबादत क्या है
कभी का'बा में कभी दैर में देखा तुझ को
ये बता दे मुझे 'राफ़त' तिरी हसरत क्या है
सामने आएँ तो खुल जाए हक़ीक़त क्या है
जो समझता ही नहीं रम्ज़-ए-मोहब्बत क्या है
दिल उसे देते हैं अपनी भी तबी'अत क्या है
तेरे दीवाने को फ़िक्र-ए-ग़म-ए-राहत क्या है
वो समझता ही नहीं दोज़ख़-ओ-जन्नत क्या है
बन गई हर रग-ए-जाँ रिश्ता-ए-शम’-ए-सोज़ाँ
नासेहा पूछ न सोज़-ए-तप-ए-फ़ुर्क़त क्या है
मर चुके दफ़्न हुए मिट गया तुर्बत का निशाँ
अब उन्हें क़ब्र पे आने की ज़रूरत क्या है
जब नज़र आता है हर चीज़ में जल्वा तेरा
फिर मैं क्यों पूछूँ कि कसरत में ये वहदत क्या है
सर-ब-ख़म हो गए हम देखते ही ऐ क़ातिल
तिरी तलवार भी मेहराब-ए-‘इबादत क्या है
कभी का'बा में कभी दैर में देखा तुझ को
ये बता दे मुझे 'राफ़त' तिरी हसरत क्या है
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