दरून-ए-ज़ात तिरी दस्तरस में आए बग़ैर

By ahmad-ayazFebruary 24, 2025
दरून-ए-ज़ात तिरी दस्तरस में आए बग़ैर
हम अपने आप से निकलेंगे सर झुकाए बग़ैर
'अजीब ख़्वाहिश-ए-उल्फ़त है दिल-गिरफ़्ता की
कि 'इश्क़ बढ़ता रहे दर्द को बढ़ाए बग़ैर


'अजीब लम्स था काँधे पे उस के रखते ही सर
सिसक के रो पड़े हम हाल-ए-दिल सुनाए बग़ैर
ये एहतिजाज-ए-गुलिस्ताँ है क्यों ये ख़ुशबूएँ
शनाख़्त पाती नहीं गुल से दूर जाए बग़ैर


जब उन से सिर्फ़ इशारों में बात है मुमकिन
तो शर्त रख दी है कीजे नज़र मिलाए बग़ैर
दिलों को जानने वाले दिल-ए-फ़सुर्दा की
कभी तो सुन कोई फ़रियाद हाथ उठाए बग़ैर


उसे भी चैन कहाँ मुझ से रूठ जाने पर
मुझे सुकून कहाँ उस को भी मनाए बग़ैर
38237 viewsghazalHindi