दश्त-ए-जुनूँ में मेरे बराबर नहीं कोई
By ahmar-nadeemFebruary 5, 2024
दश्त-ए-जुनूँ में मेरे बराबर नहीं कोई
होंगे हज़ार क़ैस प 'अह्मर' नहीं कोई
तुम ने चुनी है राह जो हमवार है बहुत
ज़ाहिद तुम्हारी राह में पत्थर नहीं कोई
तन्हा ही दुश्मनों की हदों तक पहुँच गया
बुज़दिल चले थे साथ में लश्कर नहीं कोई
'इज़्ज़त-मआब क़िबला-ओ-'आली-जनाब आप
'आली-जनाब आप सा अहक़र नहीं कोई
इस ग़म में दिल-गिरफ़्ता है 'अहमर-नदीम’ बस
सर पर गुनह का बोझ है महशर नहीं कोई
होंगे हज़ार क़ैस प 'अह्मर' नहीं कोई
तुम ने चुनी है राह जो हमवार है बहुत
ज़ाहिद तुम्हारी राह में पत्थर नहीं कोई
तन्हा ही दुश्मनों की हदों तक पहुँच गया
बुज़दिल चले थे साथ में लश्कर नहीं कोई
'इज़्ज़त-मआब क़िबला-ओ-'आली-जनाब आप
'आली-जनाब आप सा अहक़र नहीं कोई
इस ग़म में दिल-गिरफ़्ता है 'अहमर-नदीम’ बस
सर पर गुनह का बोझ है महशर नहीं कोई
12471 viewsghazal • Hindi