दश्त-ए-उल्फ़त में भटकता हुआ आहू तू है

By ustad-vajahat-husain-khanJanuary 5, 2024
दश्त-ए-उल्फ़त में भटकता हुआ आहू तू है
मैं हूँ रैहान-ए-मोहब्बत मिरी ख़ुशबू तू है
धूप में मेरे लिए सर्द हवा का झोंका
और रातों में चमकता हुआ जुगनू तू है


ग़म-ए-दिल का कोई 'उन्वान नहीं हो सकता
इस फ़साने का जो रौशन है वो पहलू तू है
तू ने बख़्शा है हर इक चीज़ को पैकर या-रब
रखने वाला भी हर इक चीज़ पे क़ाबू तू है


मुझ को है तेरी करीमी पे भरोसा या-रब
मेरा ख़ालिक़ मिरा आक़ा मिरा शाहू तू है
तेरी ये शान-ए-हमागीरी कोई क्या समझे
'अर्श पे जल्वा-फ़गन फ़र्श पे हर-सू तू है


मग़रिबी शोर-शराबे हैं अंधेरे 'दाएम'
अहल-ए-मौसीक़ी है संगीत का जुगनू तू है
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