देखने वालों से बेकार है पर्दा उन का
By munshi-shiv-parshad-wahbiJanuary 4, 2024
देखने वालों से बेकार है पर्दा उन का
चार-सू हम को नज़र आता है जल्वा उन का
देखना कितना बुलंद आज है रुत्बा उन का
हूरें काँधे पे उठाती हैं मुहाफ़ा उन का
आने जाने से वे किस के लिए घबराते हैं
नहीं दाख़िल है कचहरी में मुचलका उन का
उँगलियाँ उठने लगीं मुझ पे फ़िशानी जो मिली
कैसा अंगुश्त-नुमा करता है छल्ला उन का
और से बोलने की हम से क़सम खिलवा ली
बातों बातों में नया चल गया फ़िक़रा उन का
देखें किस आशिक़-ए-जाँबाज़ के सर जाती है
अब चढ़ा रहता है पाए पे तपंचा उन का
नक़्द-ए-जाँ माँगते ही उन के मैं दे दूँगा उन्हें
हर घड़ी का न सहूँगा ये तक़ाज़ा उन का
अब न किस तरह उन्हें आँख की पुतली समझूँ
लिख लिया है वरक़-ए-चश्म पे नक़्शा उन का
तन-ए-पुर-दाग़ को गुलज़ार न समझूँ क्यूँकर
हर घड़ी दिल में लगा रहता है खटका उन का
पाँव भी घर से निकाला नहीं अब तक लेकिन
हर गली-कूचे में होने लगा चर्चा उन का
आँख उठा कर न कभी देखता मैं उस को मगर
हूर-ए-जन्नत पे मुझे होता है धोका उन का
मछलियाँ कान के बाले की न तैरें क्यूँकर
बाढ़ पर आया है अब हुस्न का दरिया उन का
खुल गई आज मह-ओ-मेहर की क़लई हम पर
एक दीवाना है और एक है शैदा उन का
जो कि मुश्ताक़ तुम्हारे क़द-ए-बाला के हैं
गड़ गया गुलशन-ए-फ़िरदौस में झंडा उन का
ग़ैर-मुमकिन है कि हो जाए यहाँ तसफ़िय्या
फ़ैसला हश्र के दिन होगा हमारा उन का
बाढ़ रखवाते हैं वो अपनी सरोही पे अबस
क़त्ल के वास्ते काफ़ी है इशारा उन का
चूम लेता मैं अगर देखता सानेअ' के हाथ
नूर के साँचे में ढाला है सरापा उन का
लिल्लाह अल-हम्द बर आएँगी मुरादें दिल की
आज की रात है कुछ और इरादा उन का
हश्र तक मुँह न दिखाएँ मह-ओ-ख़ुर्शीद अपना
देख पाएँ वो अगर रू-ए-दिल-आरा उन का
चाक करते हैं गरेबाँ जो ग़म-ए-सरवर में
हश्र के रोज़ ख़ुदा रक्खेगा पर्दा उन का
वो बुलाते हैं अगर ग़ैरों को हर दम 'वहबी'
ले लिया जाएगा इक रोज़ मुचलका उन का
चार-सू हम को नज़र आता है जल्वा उन का
देखना कितना बुलंद आज है रुत्बा उन का
हूरें काँधे पे उठाती हैं मुहाफ़ा उन का
आने जाने से वे किस के लिए घबराते हैं
नहीं दाख़िल है कचहरी में मुचलका उन का
उँगलियाँ उठने लगीं मुझ पे फ़िशानी जो मिली
कैसा अंगुश्त-नुमा करता है छल्ला उन का
और से बोलने की हम से क़सम खिलवा ली
बातों बातों में नया चल गया फ़िक़रा उन का
देखें किस आशिक़-ए-जाँबाज़ के सर जाती है
अब चढ़ा रहता है पाए पे तपंचा उन का
नक़्द-ए-जाँ माँगते ही उन के मैं दे दूँगा उन्हें
हर घड़ी का न सहूँगा ये तक़ाज़ा उन का
अब न किस तरह उन्हें आँख की पुतली समझूँ
लिख लिया है वरक़-ए-चश्म पे नक़्शा उन का
तन-ए-पुर-दाग़ को गुलज़ार न समझूँ क्यूँकर
हर घड़ी दिल में लगा रहता है खटका उन का
पाँव भी घर से निकाला नहीं अब तक लेकिन
हर गली-कूचे में होने लगा चर्चा उन का
आँख उठा कर न कभी देखता मैं उस को मगर
हूर-ए-जन्नत पे मुझे होता है धोका उन का
मछलियाँ कान के बाले की न तैरें क्यूँकर
बाढ़ पर आया है अब हुस्न का दरिया उन का
खुल गई आज मह-ओ-मेहर की क़लई हम पर
एक दीवाना है और एक है शैदा उन का
जो कि मुश्ताक़ तुम्हारे क़द-ए-बाला के हैं
गड़ गया गुलशन-ए-फ़िरदौस में झंडा उन का
ग़ैर-मुमकिन है कि हो जाए यहाँ तसफ़िय्या
फ़ैसला हश्र के दिन होगा हमारा उन का
बाढ़ रखवाते हैं वो अपनी सरोही पे अबस
क़त्ल के वास्ते काफ़ी है इशारा उन का
चूम लेता मैं अगर देखता सानेअ' के हाथ
नूर के साँचे में ढाला है सरापा उन का
लिल्लाह अल-हम्द बर आएँगी मुरादें दिल की
आज की रात है कुछ और इरादा उन का
हश्र तक मुँह न दिखाएँ मह-ओ-ख़ुर्शीद अपना
देख पाएँ वो अगर रू-ए-दिल-आरा उन का
चाक करते हैं गरेबाँ जो ग़म-ए-सरवर में
हश्र के रोज़ ख़ुदा रक्खेगा पर्दा उन का
वो बुलाते हैं अगर ग़ैरों को हर दम 'वहबी'
ले लिया जाएगा इक रोज़ मुचलका उन का
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