धोका तिरे वजूद से आगे निकल गया
By hasrat-khan-khatakJanuary 3, 2024
धोका तिरे वजूद से आगे निकल गया
या'नी तू हस्त-ओ-बूद से आगे निकल गया
ख़ुशबू की तरह फूल से मैं फैलता रहा
और इस तरह वजूद से आगे निकल गया
मंसूर सी 'अता हुई दीवानगी मुझे
मैं सज्दा-ओ-सुजूद से आगे निकल गया
है इर्तिक़ा-ए-फ़र्द में जुरअत का ये मक़ाम
जो जम गया जुमूद से आगे निकल गया
ला के शु'ऊर से मुझे लौलाक मिल गया
और मैं तिरी हुदूद से आगे निकल गया
ख़ाकिस्तरी को ख़ाक पर ऐसा सुकूँ मिला
हर नाम हर नुमूद से आगे निकल गया
अपनी ख़ुदी में डूब के मुझ को ख़ुदा मिला
'हसरत' दवा दरूद से आगे निकल गया
या'नी तू हस्त-ओ-बूद से आगे निकल गया
ख़ुशबू की तरह फूल से मैं फैलता रहा
और इस तरह वजूद से आगे निकल गया
मंसूर सी 'अता हुई दीवानगी मुझे
मैं सज्दा-ओ-सुजूद से आगे निकल गया
है इर्तिक़ा-ए-फ़र्द में जुरअत का ये मक़ाम
जो जम गया जुमूद से आगे निकल गया
ला के शु'ऊर से मुझे लौलाक मिल गया
और मैं तिरी हुदूद से आगे निकल गया
ख़ाकिस्तरी को ख़ाक पर ऐसा सुकूँ मिला
हर नाम हर नुमूद से आगे निकल गया
अपनी ख़ुदी में डूब के मुझ को ख़ुदा मिला
'हसरत' दवा दरूद से आगे निकल गया
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