धूप में क़तरा-ए-शबनम को तरस जाओगे

By aalam-nizamiJanuary 18, 2024
धूप में क़तरा-ए-शबनम को तरस जाओगे
शहर में गाँव के मौसम को तरस जाओगे
ज़ख़्म इतने तुम्हें आवारा-मिज़ाजी देगी
गर्दिश-ए-वक़्त के मरहम को तरस जाओगे


दिन में जुगनू की तबाही पे मना लो ख़ुशियाँ
शब में चमकेगा तो मातम को तरस जाओगे
ज़िंदगी से कभी आराम तलब मत करना
दोस्तो मेहनत-ए-पैहम को तरस जाओगे


आदमिय्यत के लिबादे में रहो तुम वर्ना
एक दिन निस्बत-ए-आदम को तरस जाओगे
आज आसानी से मिलता हूँ तो मिल लो वर्ना
देखने के लिए 'आलम' को तरस जाओगे


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