दिल-ए-बे-क़रार की मा'रिफ़त बड़ी एहतियात का काम है
By ustad-azmat-hussain-khanJanuary 5, 2024
दिल-ए-बे-क़रार की मा'रिफ़त बड़ी एहतियात का काम है
यही उन की ख़ल्वत-ए-नाज़ है यही दूसरों का मक़ाम है
मैं तो मुद्दतों से हूँ मुंतज़िर कि शब-ए-फ़िराक़ की हो सहर
मगर इस नसीब को क्या करूँ न सलाम है न पयाम है
वो हज़ार तरह हैं जल्वा-गर कभी इस जगह कभी उस जगह
उन्हें ख़ुद-नुमाई का शौक़ है मिरी जुस्तुजू का तो नाम है
न दिल-ओ-निगाह पे अपना बस न ख़याल पर मिरी दस्तरस
कभी वो ही वो कभी मैं ही मैं ये बड़ा 'अजीब मक़ाम है
कभी ज़ुल्मतों में थी रौशनी कभी रौशनी में हैं ज़ुल्मतें
ये हैं इंक़लाब की करवटें जहाँ सुब्ह थी वहीं शाम है
लब-ए-शिकवा भी न हिला सकूँ उन्हें हाल-ए-ग़म न सुना सकूँ
जिसे मौत कहते हैं 'इश्क़ में इसी बे-कसी का तो नाम है
ये तो 'मैकश' एक फ़रेब है नहीं मय-कदे में ये सरख़ुशी
तू निगाह अपने ही दिल पे रख यही बादा है यही जाम है
यही उन की ख़ल्वत-ए-नाज़ है यही दूसरों का मक़ाम है
मैं तो मुद्दतों से हूँ मुंतज़िर कि शब-ए-फ़िराक़ की हो सहर
मगर इस नसीब को क्या करूँ न सलाम है न पयाम है
वो हज़ार तरह हैं जल्वा-गर कभी इस जगह कभी उस जगह
उन्हें ख़ुद-नुमाई का शौक़ है मिरी जुस्तुजू का तो नाम है
न दिल-ओ-निगाह पे अपना बस न ख़याल पर मिरी दस्तरस
कभी वो ही वो कभी मैं ही मैं ये बड़ा 'अजीब मक़ाम है
कभी ज़ुल्मतों में थी रौशनी कभी रौशनी में हैं ज़ुल्मतें
ये हैं इंक़लाब की करवटें जहाँ सुब्ह थी वहीं शाम है
लब-ए-शिकवा भी न हिला सकूँ उन्हें हाल-ए-ग़म न सुना सकूँ
जिसे मौत कहते हैं 'इश्क़ में इसी बे-कसी का तो नाम है
ये तो 'मैकश' एक फ़रेब है नहीं मय-कदे में ये सरख़ुशी
तू निगाह अपने ही दिल पे रख यही बादा है यही जाम है
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