दिल के लिए हयात का पैग़ाम बन गईं
By baqi-siddiquiJanuary 19, 2024
दिल के लिए हयात का पैग़ाम बन गईं
बे-ताबियाँ सिमट के तिरा नाम बन गईं
कुछ लग़्ज़िशों से काम जहाँ के सँवर गए
कुछ जुरअतें हयात पर इल्ज़ाम बन गईं
हर-चंद वो निगाहें हमारे लिए न थीं
फिर भी हरीफ़-ए-गर्दिश-ए-अय्याम बन गईं
आने लगा हयात को अंजाम का ख़याल
जब आरज़ूएँ फैल के इक दाम बन गईं
कुछ कम नहीं जहाँ से जहाँ की मसर्रतें
जब पास आईं दुश्मन-ए-आराम बन गईं
'बाक़ी' जहाँ करेगा मिरी मय-कशी पे रश्क
उन की हसीं निगाहें अगर जाम बन गईं
बे-ताबियाँ सिमट के तिरा नाम बन गईं
कुछ लग़्ज़िशों से काम जहाँ के सँवर गए
कुछ जुरअतें हयात पर इल्ज़ाम बन गईं
हर-चंद वो निगाहें हमारे लिए न थीं
फिर भी हरीफ़-ए-गर्दिश-ए-अय्याम बन गईं
आने लगा हयात को अंजाम का ख़याल
जब आरज़ूएँ फैल के इक दाम बन गईं
कुछ कम नहीं जहाँ से जहाँ की मसर्रतें
जब पास आईं दुश्मन-ए-आराम बन गईं
'बाक़ी' जहाँ करेगा मिरी मय-कशी पे रश्क
उन की हसीं निगाहें अगर जाम बन गईं
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