दूर निकला है उफ़ुक़ पर कहीं तारा कोई
By shahbaz-choudharyJanuary 5, 2024
दूर निकला है उफ़ुक़ पर कहीं तारा कोई
याद आता है मुझे जान से प्यारा कोई
इश्क़-ए-नाकाम का इल्ज़ाम नसीबों पे गया
इसी निस्बत से कोई जीता न हारा कोई
तुम जिसे चाहो उसे चाहे ज़माना सारा
इस से बढ़ कर नहीं होता है ख़सारा कोई
शहर का शहर त'आक़ुब में निकल आया है
मैं ने बस्ती पे किया था जो इशारा कोई
तुम न समझोगे कभी ताज का मिट्टी होना
तुम ने देखा ही नहीं वक़्त का मारा कोई
रहगुज़र नाम की तेरी थी सो तन्हा काटी
हम ने आवाज़ लगाई न पुकारा कोई
याद आता है मुझे जान से प्यारा कोई
इश्क़-ए-नाकाम का इल्ज़ाम नसीबों पे गया
इसी निस्बत से कोई जीता न हारा कोई
तुम जिसे चाहो उसे चाहे ज़माना सारा
इस से बढ़ कर नहीं होता है ख़सारा कोई
शहर का शहर त'आक़ुब में निकल आया है
मैं ने बस्ती पे किया था जो इशारा कोई
तुम न समझोगे कभी ताज का मिट्टी होना
तुम ने देखा ही नहीं वक़्त का मारा कोई
रहगुज़र नाम की तेरी थी सो तन्हा काटी
हम ने आवाज़ लगाई न पुकारा कोई
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