इक दफ़ा देखती मुझे मिरी जाँ
By rohit-gaur-ruuhJanuary 4, 2024
इक दफ़ा देखती मुझे मिरी जाँ
हूँ बहुत चाहता तुझे मिरी जाँ
चाँद सूरज से हैं तिरे जल्वे
बादलों सी जले बुझे मिरी जाँ
फूल पत्ती कली हवा सब में
तू ही तू अब दिखे मुझे मिरी जाँ
रास आती नहीं कोई सूरत
यूँ उचटती लगे मुझे मिरी जाँ
काँपता है बदन ये सोच के ही
'रूह' भूले कभी तुझे मिरी जाँ
हूँ बहुत चाहता तुझे मिरी जाँ
चाँद सूरज से हैं तिरे जल्वे
बादलों सी जले बुझे मिरी जाँ
फूल पत्ती कली हवा सब में
तू ही तू अब दिखे मुझे मिरी जाँ
रास आती नहीं कोई सूरत
यूँ उचटती लगे मुझे मिरी जाँ
काँपता है बदन ये सोच के ही
'रूह' भूले कभी तुझे मिरी जाँ
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