इक फ़ाख़्ता ये पूछ रही है हवाओं से

By balraj-hairatJanuary 2, 2024
इक फ़ाख़्ता ये पूछ रही है हवाओं से
कब तक चलेगा काम तुम्हारी दु'आओं से
मोती लुटा रहे हैं सितारे अदाओं से
ख़ैरात ज़ौ की लाए हैं सूरज के गाओं से


ऐ इंतिहा-ए-शौक़ ज़रा सब्र कर अभी
उलझा हुआ है ज़ेहन अभी इब्तिदाओं से
ऐ तीरगी के साँप मिरे दिल पे लोट जा
तेरा ही ज़िक्र-ए-ख़ैर था धुँदली फ़ज़ाओं से


दी हैं जो आह-ए-नीम-शबी ने बसीरतें
काफ़ूर हो न जाएँ सहर की दु'आओं से
नन्हा सा इक फ़रिश्ता खड़ा देखता रहा
कुछ कह रहा था आदमी बरगद की छाओं से


शब-भर भंभोड़ता रहा कुत्ता क़यास का
ऐसी भी दिल-लगी न किया कर गदाओं से
'हैरत' ये ए'तिक़ाद का अंधा कुआँ नहीं
बच कर निकल शु'ऊर की जलती चिताओं से


65020 viewsghazalHindi