इक तिरा तसव्वुर ही आख़िरी सहारा है
By badiuzzaman-saharJanuary 19, 2024
इक तिरा तसव्वुर ही आख़िरी सहारा है
वर्ना दिल का आईना कब से पारा-पारा है
ज़िंदगी ख़बर भी है बेवफ़ा ज़माने में
मैं ने तेरी ज़ुल्फ़ों को किस तरह सँवारा है
एक दिल की तन्हाई और सौ ग़म-ए-दौराँ
मैं ने दर्द-ए-दुनिया पे दर्द-ए-दिल को वारा है
मैं हूँ इस किनारे पर तुम हो उस किनारे पर
बीच में समुंदर का कितना तेज़ धारा है
दिल तड़प गए होंगे बाग़ में 'अनादिल के
मैं ने बेवफ़ा तुझ को जिस तरह पुकारा है
इज़िदहाम-ए-जल्वा है बारिश-ए-तजल्ली है
दामन-ए-नज़र किस ने शौक़ से पसारा है
लोग ठीक कहते हैं क़ब्र पर मिरी आ कर
मौत से ये क्या मरता ज़िंदगी ने मारा है
दिल के आबगीने को ठेस लग गई कैसे
क्या किसी ने फिर मुझ को दूर से पुकारा है
बोल तेरे कानों से किस की चीख़ टकराई
हाए कितना लर्ज़ीदा तेरा गोश्वारा है
ऐ 'सहर' चले आते तुम भी सैर-ए-गुलशन को
बाद-ए-नौ-बहारी है शबनमी नज़्ज़ारा है
वर्ना दिल का आईना कब से पारा-पारा है
ज़िंदगी ख़बर भी है बेवफ़ा ज़माने में
मैं ने तेरी ज़ुल्फ़ों को किस तरह सँवारा है
एक दिल की तन्हाई और सौ ग़म-ए-दौराँ
मैं ने दर्द-ए-दुनिया पे दर्द-ए-दिल को वारा है
मैं हूँ इस किनारे पर तुम हो उस किनारे पर
बीच में समुंदर का कितना तेज़ धारा है
दिल तड़प गए होंगे बाग़ में 'अनादिल के
मैं ने बेवफ़ा तुझ को जिस तरह पुकारा है
इज़िदहाम-ए-जल्वा है बारिश-ए-तजल्ली है
दामन-ए-नज़र किस ने शौक़ से पसारा है
लोग ठीक कहते हैं क़ब्र पर मिरी आ कर
मौत से ये क्या मरता ज़िंदगी ने मारा है
दिल के आबगीने को ठेस लग गई कैसे
क्या किसी ने फिर मुझ को दूर से पुकारा है
बोल तेरे कानों से किस की चीख़ टकराई
हाए कितना लर्ज़ीदा तेरा गोश्वारा है
ऐ 'सहर' चले आते तुम भी सैर-ए-गुलशन को
बाद-ए-नौ-बहारी है शबनमी नज़्ज़ारा है
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