फ़लक-नशीं हैं कभी आज़मा के देखा जाए
By shehzad-anjum-burhaniJanuary 5, 2024
फ़लक-नशीं हैं कभी आज़मा के देखा जाए
सदाएँ हम को वहीं से लगा के देखा जाए
वो सद-हिजाब में रू-पोश भी नहीं लेकिन
हवस है दीद को पर्दा उठा के देखा जाए
हर इक सुख़न पे सताइश 'अज़ाब लगती है
कभी तो हम को नज़र से गिरा के देखा जाए
वो फूल है तो उसे जान तक करो महसूस
वो चाँद है तो अंधेरा बढ़ा के देखा जाए
अगर वो 'इश्क़ है हँस कर पहाड़ उठा लोगे
अगर है बोझ तो सर से गिरा के देखा जाए
लताफ़त-ए-रुख़-ए-ज़ेबा पे बार हैं नज़रें
सो शर्त ये है कि पलकें झुका के देखा जाए
सदाएँ हम को वहीं से लगा के देखा जाए
वो सद-हिजाब में रू-पोश भी नहीं लेकिन
हवस है दीद को पर्दा उठा के देखा जाए
हर इक सुख़न पे सताइश 'अज़ाब लगती है
कभी तो हम को नज़र से गिरा के देखा जाए
वो फूल है तो उसे जान तक करो महसूस
वो चाँद है तो अंधेरा बढ़ा के देखा जाए
अगर वो 'इश्क़ है हँस कर पहाड़ उठा लोगे
अगर है बोझ तो सर से गिरा के देखा जाए
लताफ़त-ए-रुख़-ए-ज़ेबा पे बार हैं नज़रें
सो शर्त ये है कि पलकें झुका के देखा जाए
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