फ़राग़-ए-मेह्र-ओ-वफ़ा से जो हट नहीं सकता
By mirza-naseer-khalidJanuary 4, 2024
फ़राग़-ए-मेह्र-ओ-वफ़ा से जो हट नहीं सकता
कभी समाज से मिल्लत से कट नहीं सकता
जो सिद्क़-ए-दिल से तू कर दे मिरी सताइश भी
मुझे यक़ीं है तिरा क़द भी घट नहीं सकता
हवाला उस का कभी मो'तबर नहीं रहता
जो आप अपने उसूलों पे डट नहीं सकता
मिरे वजूद की सब किर्चियाँ सँभाल के रख
कि अब मज़ीद मैं टुकड़ों में बट नहीं सकता
किसी का साथ न हो तो बहुत ही मुश्किल है
ये ज़िंदगी का सफ़र यूँही कट नहीं सकता
इसे 'अमल के पसीने की बारिशों से बिठा
ग़ुबार-ए-राह दु'आओं से छट नहीं सकता
बहू को अपनी ही बेटी समझ ले सास अगर
तो फिर किसी पे भी चूल्हा ये फट नहीं सकता
फ़क़त उसे ही पता है मैं क्या हूँ अंदर से
मैं अपनी ज़ात के आगे तो डट नहीं सकता
और अब तो तख़्त या तख़्ते की बात है 'ख़ालिद'
मैं आ गया जो मुक़ाबिल तो हट नहीं सकता
कभी समाज से मिल्लत से कट नहीं सकता
जो सिद्क़-ए-दिल से तू कर दे मिरी सताइश भी
मुझे यक़ीं है तिरा क़द भी घट नहीं सकता
हवाला उस का कभी मो'तबर नहीं रहता
जो आप अपने उसूलों पे डट नहीं सकता
मिरे वजूद की सब किर्चियाँ सँभाल के रख
कि अब मज़ीद मैं टुकड़ों में बट नहीं सकता
किसी का साथ न हो तो बहुत ही मुश्किल है
ये ज़िंदगी का सफ़र यूँही कट नहीं सकता
इसे 'अमल के पसीने की बारिशों से बिठा
ग़ुबार-ए-राह दु'आओं से छट नहीं सकता
बहू को अपनी ही बेटी समझ ले सास अगर
तो फिर किसी पे भी चूल्हा ये फट नहीं सकता
फ़क़त उसे ही पता है मैं क्या हूँ अंदर से
मैं अपनी ज़ात के आगे तो डट नहीं सकता
और अब तो तख़्त या तख़्ते की बात है 'ख़ालिद'
मैं आ गया जो मुक़ाबिल तो हट नहीं सकता
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