फ़रेब-ए-शौक़ न दे वक़्फ़-ए-इम्तिहाँ न बना

By ustad-azmat-hussain-khanJanuary 5, 2024
फ़रेब-ए-शौक़ न दे वक़्फ़-ए-इम्तिहाँ न बना
मिरी तलब को बस अब और भी गिराँ न बना
'अता-ए-दोस्त है ये जिंस-ए-राएगाँ न बना
तुझे जो दर्द मिला है उसे फ़ुग़ाँ न बना


बनाना चाहे तो अब बिजलियों से दे तरतीब
चमन में अब कभी तिनकों का आशियाँ न बना
कभी वो फ़ाएज़-ए-जल्वा है और कभी महरूम
मुझे ख़ुद अपने ही दिल से तू बद-गुमाँ न बना


सभी को हो गया अब तेरे 'इश्क़ का दा'वा
कहा तो था कि मोहब्बत को दास्ताँ न बना
हलाक-ए-दर्द-ए-मोहब्बत मुझी को रहने दे
निगाह-ए-नाज़ को ग़ारत-गर-ए-जहाँ न बना


रहा 'अज़ाब में दिल का मु'आमला 'मैकश'
रह-ए-वफ़ा में कोई भी तू राज़-दाँ न बना
27204 viewsghazalHindi