फ़साना-ए-ग़म-ए-जानाँ किसी पे बार नहीं
By ustad-azmat-hussain-khanJanuary 5, 2024
फ़साना-ए-ग़म-ए-जानाँ किसी पे बार नहीं
अब अपने दिल के सिवा कोई राज़दार नहीं
मिरी निगाह की रिफ़'अत पे है मदार उस का
तिरी अदा पे मोहब्बत का इंहिसार नहीं
बदल न जाए कहीं मेरे ए'तिमाद का रुख़
वो मो'तबर है यहाँ जिस का ए'तिबार नहीं
इक ऐसा जाम इधर भी बहार के साक़ी
ब-क़द्र-ए-ज़र्फ़ अभी तक मुझे ख़ुमार नहीं
ब-ज़िद है आज जहाँ को तबाह करने पर
ये आदमी कि जिसे कोई इख़्तियार नहीं
कुछ इस तरह से हुई है चमन की नश्व-ओ-नुमा
मिरी निगाह की हद तक कहीं बहार नहीं
ख़िज़ाँ-नसीब हैं अब तक फ़ज़ाएँ गुलशन की
चमन के ज़र्फ़ में गुंजाइश-ए-बहार नहीं
फ़ज़ाएँ गूँज उठेंगी मिरे तरानों से
ख़मोश हूँ कि अभी मौसम-ए-बहार नहीं
मिज़ाज दिल का समझ में न आ सका 'मैकश'
ख़ुशी भी रास नहीं ग़म भी साज़गार नहीं
अब अपने दिल के सिवा कोई राज़दार नहीं
मिरी निगाह की रिफ़'अत पे है मदार उस का
तिरी अदा पे मोहब्बत का इंहिसार नहीं
बदल न जाए कहीं मेरे ए'तिमाद का रुख़
वो मो'तबर है यहाँ जिस का ए'तिबार नहीं
इक ऐसा जाम इधर भी बहार के साक़ी
ब-क़द्र-ए-ज़र्फ़ अभी तक मुझे ख़ुमार नहीं
ब-ज़िद है आज जहाँ को तबाह करने पर
ये आदमी कि जिसे कोई इख़्तियार नहीं
कुछ इस तरह से हुई है चमन की नश्व-ओ-नुमा
मिरी निगाह की हद तक कहीं बहार नहीं
ख़िज़ाँ-नसीब हैं अब तक फ़ज़ाएँ गुलशन की
चमन के ज़र्फ़ में गुंजाइश-ए-बहार नहीं
फ़ज़ाएँ गूँज उठेंगी मिरे तरानों से
ख़मोश हूँ कि अभी मौसम-ए-बहार नहीं
मिज़ाज दिल का समझ में न आ सका 'मैकश'
ख़ुशी भी रास नहीं ग़म भी साज़गार नहीं
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