फ़स्ल आई ग़म की जादू शौक़ के चलने लगे

By ishrat-jahangirpuriJanuary 3, 2024
फ़स्ल आई ग़म की जादू शौक़ के चलने लगे
बाग़-ए-वहशत के शजर फिर फूलने फलने लगे
ज़िंदगी मेरी बदल दी बरहमी-ए-नाज़ ने
दर्द के साँचे में लम्हात-ए-तरब ढलने लगे


दिलबरी को फिर वफ़ा का इम्तिहाँ मंज़ूर है
साया-ए-मिज़्गाँ में उन के फ़ित्ने फिर पलने लगे
फ़स्ल-ए-गुल तू ही बता ये दौर कैसा आ गया
अब तो आए दिन चमन में आशियाँ जलने लगे


राज़-ए-हस्ती खोलती है जैसे फ़ितरत की ज़बाँ
दास्ताँ तारों की सुनिए रात जब ढलने लगे
इस से बढ़ कर और क्या मुझ को मिटाएँगे कि वो
ख़ुद कफ़-ए-अफ़सोस मेरे हाल पर मलने लगे


मुस्कुराया है तसव्वुर में ये 'इशरत' कौन आज
हर तरफ़ बज़्म-ए-तमन्ना में दिये जलने लगे
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