गर्दिश-ए-वक़्त का मंज़र नहीं देखा जाता

By umair-ali-anjumJanuary 5, 2024
गर्दिश-ए-वक़्त का मंज़र नहीं देखा जाता
यार के हाथ में ख़ंजर नहीं देखा जाता
कोई रुख़्सत करे और आँख में आँसू भी न हों
ऐसे लम्हात में मुड़ कर नहीं देखा जाता


ये रिवायत मिरे पुरखों से चली आई है
'इश्क़ में यार को छू कर नहीं देखा जाता
ऐ ख़ुदा शहर के हाकिम को हिदायत दे दे
चार-सू 'अर्सा-ए-महशर नहीं देखा जाता


हम कि दम तोड़ती क़द्रों के अमीं हैं हम से
बिंत-ए-हव्वा का खुला सर नहीं देखा जाता
हाए उस हुस्न-ए-बला-ख़ेज़ की तासीर 'उमैर'
देर तक उस को बराबर नहीं देखा जाता


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