ग़ज़ब था उन निगाहों से निगाहें चार हो जाना
By raft-bahraichiJanuary 4, 2024
ग़ज़ब था उन निगाहों से निगाहें चार हो जाना
वो उन का तोड़ कर दिल को जिगर के पार हो जाना
नज़ाकत दे अगर मश्क़-ए-ख़िराम-ए-नाज़ की रुख़्सत
सू-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ भी कभी ऐ यार हो जाना
दिल-ए-दीवाना से क्या बह्सते हो होश में आओ
ये क्या है इक ज़रा सी छेड़ पर बेज़ार हो जाना
वो उठ जाना किसी 'ईसा-नफ़स का मेरी बालीं से
वो अच्छा होते होते फिर मिरा बीमार हो जाना
तरीक़-ए-‘इश्क़ में ऐ ख़िज़्र है इक इम्तिहाँ ये भी
अजल का सहल होना ज़िंदगी दुश्वार हो जाना
ज़रा कुछ होश में आ लें तो हम मूसा से ये पूछें
कि कैसा है किसी का तालिब-ए-दीदार हो जाना
हज़ारों पड़ गए रख़्ने दिल-ओ-जाँ में मिरी 'राफ़त'
वो हट कर उन का रौज़न से पस-ए-दीवार जाना
वो उन का तोड़ कर दिल को जिगर के पार हो जाना
नज़ाकत दे अगर मश्क़-ए-ख़िराम-ए-नाज़ की रुख़्सत
सू-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ भी कभी ऐ यार हो जाना
दिल-ए-दीवाना से क्या बह्सते हो होश में आओ
ये क्या है इक ज़रा सी छेड़ पर बेज़ार हो जाना
वो उठ जाना किसी 'ईसा-नफ़स का मेरी बालीं से
वो अच्छा होते होते फिर मिरा बीमार हो जाना
तरीक़-ए-‘इश्क़ में ऐ ख़िज़्र है इक इम्तिहाँ ये भी
अजल का सहल होना ज़िंदगी दुश्वार हो जाना
ज़रा कुछ होश में आ लें तो हम मूसा से ये पूछें
कि कैसा है किसी का तालिब-ए-दीदार हो जाना
हज़ारों पड़ गए रख़्ने दिल-ओ-जाँ में मिरी 'राफ़त'
वो हट कर उन का रौज़न से पस-ए-दीवार जाना
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