गिला उसे है अगर आ के रू-ब-रू तो करे

By bazm-ansariJanuary 2, 2024
गिला उसे है अगर आ के रू-ब-रू तो करे
यक़ीं करे न करे हम से गुफ़्तुगू तो करे
वो बद-गुमाँ है तो इक़रार क्यों नहीं करता
वो सरगिराँ है तो इज़हार दू-बदू तो करे


वो क्यों है चीं-ब-जबीं राज़ तो खुले आख़िर
चराग़-पा है वो क्यों कोई जुस्तुजू तो करे
न बर्क़ है न शरारा न शो’ला-ए-ख़ुर्शीद
मगर निगाह कोई उस के रू-ब-रू तो करे


मैं क्या कहूँ लब-ए-गोया ने साथ छोड़ दिया
वो कह रहे हैं कि ये शरह-ए-आरज़ू तो करे
शिकस्त हो के भी बे-दस्त-ओ-पा न हो कोई
जो और कुछ न करे हिफ़्ज़-ए-आबरू तो करे


तमाम हो किसी सूरत ये दास्तान-ए-सितम
वो ख़त्म कश्मकश-ए-ख़ंजर-ओ-गुलू तो करे
करे न 'बज़्म' कोई गुम-रही पे ता’ना-ज़नी
मैं खो गया हूँ कोई मेरी जुस्तुजू तो करे


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